बरखा

बरखा /बारिश
अंजन लगे नयन दिखे,बरसे बरखा रैन ।
कंचन लिये सजन खड़े, छिनते पुष्पन चैन ।।

लाल हरी छतरी लिये , सजाते चले साज ।
तन बदन अनल खेलते, बरखा गीरे आज ।।

बरखा रानी झूमती , खिले पवन पतवार ।
धरती घानी दीखती, ठंडी चले बयार।।

मदमाती पवन चलती, करे शलभ श्रृंगार ।
बरखा बुन्दन थिरकनसे,मचले गोरी सार ।।
*नवीन कुमार तिवारी,,,*

         

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