मन चाहा

*मन चाहा*
मन चाहा कब कब मिला,देखा रोते पास ।
मतलब निकले खिसकते ,काहे विलाप आस ।।

काजल की ये कोठरी, कालिख रहे लगाय ।
लालच में जो डूबते, बिन पानी मर जाय ।।

सोच सोच मन डूबता ,याद करे कब ख़ास ।
लाज शर्म छोड़ रहता , वही दार का दास ।।

मन चाहा सब खोजते, देने को उपहार ।
मिल जाये तो सोचता ,रखने को मनुहार ।।
*नवीन कुमार तिवारी,अथर्व*

         

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