मातृव दिवस

जिनके क़दमों से मिला, चलने का आधार।
माँ से ही ये ‘भवि’ बनी, माँ से ही संसार।।

देखो अब औलाद को,पढ़कर अक्षर चार।
माँ को शिक्षा दे रहे,कैसा हो व्यवहार।

पूर्ण सुरक्षित है जगह,जग में माँ की गोद।
बच्चे करते हैं जहाँ, ‘भवि’ मन से आमोद।।

मिले नहीं संसार में, कोई माँ के बाद।
उन जैसा जो दे सके,’भवि’ हमको बुनियाद।।

करुणा की वो मूर्ति है, ममता भरी अथाह।
उसके दिल से लो दुआ,माँ की लो मत आह।।

माँ का निश्छल प्रेम ही, हर लेता सब पीर।
वरना हर रिश्ता यहाँ, जैसे इक जंजीर।।

जीवन बस चलती सड़क , मिले कहाँ आराम।
जाना माँ के बाद ही, क्या होता है काम।।

         

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