मानव विभीषिका युध्द

*हार* मानवता का,,,,
पराजित हो मानवता, कर रहा अत्याचार ।
अंतकाल ये दीखता, काल चक्र इंतजार ।

कुरूप मानव सभ्यता , करता कैसा वार ।
अंहकारी बन हँसते , मौत भये व्यापार ।।

युद्ध विभीषिक त्रासदी, देखो ठोके ताल ।
आँख तरेरते विप्लवी , दिख मानव कंकाल ।।

महा समर आखेट पे, सुना रहा टंकार ।
मानव हन्ता हँस रहे , विकल मन चीत्कार ।।

चील कौवो से ग्रसते, शांत चमन पर वार ।
युध्द सकारण थोपते, अंहकार ही हार ।।
*नवीन कुमार तिवारी*,,,

         

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