मेहनत पर दोहे

*मेहनत*

मेहनत कर कमा रहे ,कैसा गर्द गुबार।
मजदूरी छीने गये, कभी आकर उबार ।।

सर्द गर्म बरसात पे, करते है हम काम ।
घर मकान बने किसका ,हो जाते नाकाम ।

भाग्य फल सभी देखते ,कर्म गति भी सुधार ।
कड़े मेहनत कीजिये,मेहनत कर उबार ।।

पसीना सबके गिरते , असल करे पहचान।
मेहनत तभी तुम किये , जब मिलता प्रतिमान ।।
नवीन कुमार तिवारी,,

         

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