श्रद्धान्जली

परम श्रद्धेय श्री गोपाल दास नीरज जी को विनम्र श्रद्धांजलिस्वरूप कुछ दोहे—-

हिन्दी शोकाकुल हुई , उर्दू हुई उदास
‘नीरज’तुम संग ले गए , मेरी हृदय उजास

गीत तुम्हारे यूँ लगें , जैसे मंद बयार
कानों में मधु घोलती , भावों की रसधार

कहीं तुम्हारे काव्य में , रही जागती रात
कहीं निशा को भेदकर, हुआ प्रदीप्त प्रभात

किया समाहित छंद में, जीवन का हर भाग
बरसाते मधुरस कभी , कभी जगाते आग

कंटकीर्ण हर राह थी , चहुँ दिस था निर्वात
चंद्रहास लेखन बना , तोड़े झंझावात

आज तुम्हारे गमन पर, मन है बहुत अधीर
शब्दों में कैसे कहूँ , अपने मन की पीर
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भरत दीप

         

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