समाज

समाज

समाज की दिशा बदलें , रहती सबकी सोच ।
लूट पाट बढ़े कुनबा , देखी ऐसी लोच ।।

बदल डालो समाज को , कहते नेता आज ।
लूट खसोट जो करते , साथ बजाते साज ।।

समाज के दायित्व में , नैतिकता का पाठ ।
निकल जाये मतलब जी , उल्लू बनते काठ ।।

राग अलापिये एकता , सोचते मिले ताज ।
सत्ता कुर्सी के मिलते, समाज देखे लाज ।।
नवीन कुमार तिवारी ,,

         

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