आवाहन -आल्हा/वीर छंद

वेद ऋचाएँ नैतिकता को ,
मानव करें सभी स्वीकार।
ताकि धरा अम्बर तक महके,
खुशियाँ चहकें कर मनुहार।।

गहन तिमिर को चीर मही पर,
तेज – पुंज से हो साकार।
दुख की परछायी हरने को,
सबको देने आया प्यार।।

किन्तु ध्वंस में जीवन ढूँढ़े ,
मूढ़ मनुज मन रहे विचार।
पग – पग पर बाधा पहुँचाते,
छुप छुप करते हर क्षण वार।।

प्रेम दया अपनत्व न जाने,
ऐसे मानव को धिक्कार।
दुष्ट प्रलापी हिंसक घाती,
बहुत हुआ अब अत्याचार।।

सबक सिखाना आवश्यक है,
देखे नयन खोल संसार।
सहन शक्ति का सिन्धु शुष्क अब,
दहक रहा उर में अंगार।।

चने नाक से चबवाने को,
डटकर आज हुआ तैयार।
त्राहि – त्राहि का क्रंदन गूँजे,
आहत अचला हुई अपार।।

हृदय – वेदना मुखरित होती,
हुई लेखनी यह तलवार।
रणभेरी सा गर्जन करते,
शब्द – बाण के तीक्ष्ण प्रहार।।

प्रश्न नहीं अब जीत हार का ,
रण – कौशल दिखला ललकार।
कालनिशा अब नियत समय से,
पहले दौड़ी हो तैयार।।

अरि – छाती के शोणित पर ही,
कर लो नर्तन रही पुकार।
करो प्रतिज्ञा हे सर्वेश्वर,
हो जग का अब नव उद्धार।।

परशुराम का फरसा प्यासा,
धनुष चाहता है टंकार।
मूल नष्ट हों पातक – पामर ,
अमिट रहे वसुधा श्रृंगार।।

नादमयी हो सप्त स्वरो से,
देव मुदित हों ले अवतार।
लोक अलौकिक यह बन जाए,
सुख वैभव हो अपरम्पार।।

जाग जाग अन्तर से प्राणी,
आज समय की यही पुकार।
तेज तिलक मस्तक का कहता,
अभय दान मत दो हर बार।।

शुभा शुक्ला मिश्रा ‘अधर’

         

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