जीवन, समाज और देश

1)
घर की मुर्गी तो दाल बराबर, करती नहीं अब कुकड़ू कू।
बाबाओं के फेर में पड़कर, जीवन, समाज, देश डूबा क्यूँ।

जीवन खेल, बिन इंजन रेल सा,फिर भी करता छुक छुक कू।
अंधविश्वास-अंधश्रद्धा में पड़कर,सहपरिवार मनु लटका क्यूँ।

नूतन पीढ़ी का हाल न पूछो, चिल-पिल करती है हर ज़ू।
अच्छे भले देश को बिठाया, कान पकड़कर उकड़ू क्यूँ।
2)
सजी जीभ पर गाली गलोच, गहरे गर्त में गिरती सोच।
वीभत्स रस का खुला प्रयोग, भोग रहे सब आंनद भोग।

समाज सेवा का करें दिखावा, देश भक्ति बन गई चोंचला।
रंगीन उल्टा चश्मा लगाकर, उजाड़ा नीलम जीवन घोंसला।

परस्पर करते ओछी आलोचना, छोड़ दिया मानों हो सोचना।
प्रगति विकास बने मात्र विवाद, उन्नति करते नित दंगा फसाद।

नेता जमात वोटों पर बलिहारी, रुदाली बनी राजनीती बेचारी।
अंधेर नगरी में चुना चौपट राजा, जनता की भी गई मति मारी।

3)
जीवन, समाज और देश की नेताओं ने लुटिया डूबाई
विकास मार्ग पर बढ़ा जो आगे, देखी भयानक गहरी खाई।
मैं हूँ आम आदमी भाई, मैं हूँ आम आदमी भाई………..….!

पढ़ा लिखा पर हूँ अंधविश्वासी, घर में ही खुद धूनी रमाई
पितृ मुक्ति तृप्ति यज्ञ करवाकर, संयुक्त में फाँसी लगाई।
मैं हूँ आम आदमी भाई, मैं हूँ आम आदमी भाई………..….!

रट्टू तोता बनी है पब्लिक, अच्छे दिनों की रटन लगाई।
जी एस टी और नोटबन्दी से, सबके तोते उड़ गए भाई।
मैं हूँ आम आदमी भाई, मैं हूँ आम आदमी भाई………..….!

नीलम शर्मा

         

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