बात करती हैं शिलाएँ

बात करती हैं शिलाएँ

पेड़, पर्वत और नदियाँ,
हैं सभी की निज व्यथाएँ.
राम आयेंगे कहो कब ?
बात करती हैं शिलाएँ.

मेड़ छोटी हो गयी है,
खिंच रही दीवार घर में.
खाट बापू की खड़ी है,
माँ दिखे लाचार घर में.

शाख पीपल की कटी,
मुरझा गयीं कोमल लताएँ.

है पहुँच से दूर मंजिल,
गर्म रेतीली डगर है.
साथ दे अंतिम समय तक,
अब कहाँ वह हमसफर है.

रोज गम की आँधियाँ हैं,
मुँह चिढ़ाती आपदाएँ.

भाव की कीमत नहीं कुछ,
प्रेम के रँग धुल रहे हैं.
कौन भारी, कौन हल्का
रोज रिश्ते तुल रहे हैं.

खत्म कर दीं स्वार्थ ने सब,
प्यार की सम्भावनाएँ.

         

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