वर्षा

उमड़ उमड़ रहे घुमड़ घुमड़,
घन बरसाने को वर्षा
घरड़ घरड़ सुन गरज गरज,
प्यासी धरा उर हर्षा।

छम छम बूंदें बाज रहीं,
थिरके प्रकृति अलबेली।
श्रावण माह में पड़ गये झूले,
सखियां करें अठखेली।

हुलस हुलस कर कुहके कोयल,
मधुर शहद सी उसकी बोली।
आ हाथ पकड़ बरसात में भीगें,
हम तुम सजना हमजोली।

मेह, वृष्टि, बारिश और बर्खा,
पिया मिलन की आस जगाती।
होले से नटखट पुर्वा कुछ कहकर,
मोहे छेड़ छेड़ हाय जाती।

नव दुल्हन से खिले वन-उपवन
सुमन,तरु- ताड़,लता-वल्लरी,
मिटी तपन ज्वर ग्रसित धरती की,
हुई अतिशय भाव विहल्ल री।

सुन वर्षा, संपूर्ण प्राणी जगत का,
अमिट आस विश्वास है तुम पर।
झमाझम बूंदों से प्यास बुझादो,
बरसकर गांव,शहर,महानगर।

तेरी रिमझिम से ए बरसात,
अचला करती सोलह श्रृंगार ।
तेरे आगमन से श्रावण में,
छाई मनहर बयार बहार।

कहे नीलम प्यारी वर्षा-वृष्टि,
स्याह मेघ-घन साथ ले आओ।
करुं करबद्ध अरज,निवेदन
प्यासी वसुधा की प्यास बुझाओ।

नीलम शर्मा

         

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