चित्त

अस्तांचल रवि पीताम्बर नभ,जग सतरंगी वस्त्र पहनावत।
आकुल व्याकुल विरह विरहणी,पिय गृह आवन वाट निहारत।
सांझ को आन के गृह तरु पर खग कोलाहल कर नभ गुंजावत।
मंदिर-मंदिर धाय के रमणी विरह विसार हरि चित्त लगावत।।

नाम-कृष्ण कान्त तिवारी “दरौनी”

         

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