तुम दो मुझ को आवाज

तुम दो मुझको आवाज कान्हा,
खोई मैं वन मे…..
खोई मैं वन में कान्हा जग के जंगल में
तुम दो मुझ को आवाज कान्हा खोई मैं वन में।

साँझ सवेरे नैना बरसेे, तेरे दर्शन को ये तरसे।
कर दो कृपा की बरसात कान्हा खोई मैं वन में।
तुम दो मुझको आवाज……….

बीच भँवर में जीवन ड़ोले, लहर लहर खाये हिचकोले।
अब लो पतवार संभाल कान्हा खोई मैं वन में ।
तुम दो मुझको ………..

कितनी बार वृन्दावन भटकी,साँस साँस अब तुझमें अटकी।
तुम ही जीवन के आधार कांहा खोई मैं वन में।
तमु दो मुझको आवाज………..

ऐसा क्या माँगा है मैंने, जो तुम अब तक छुपे हुए।
आकर पकड़ो बाह हमार, ठाकुर खोई मैं वन में।
तुम दो मुझको ………

सुख दो चाहे दुख दो गिरधर बस एक बात जरूरी है।
होती रहे सदा मुलाकात ,कांन्हा खोई मैं वन में।
तुम दो मुझको आवाज कान्हा खोई मैं वन मे।
खोई मैं वन में कांहा जग के जंगल में……..।
——राजश्री—–

         

Share: