संक्रांति

भाग्य नीलम का चमका दो ऐसे है जैसे भाल तेरा कान्हा,
देखो उत्तरायण पंहुचे दिनकर, तुम नूतन साल मनाने आना।
हर्षित हृदय,नव उदित भानु, तुम दाल चूरमा संग में खाना।
दाल चावल,स्वादिष्ट खिचड़ी,गुड़-तिल का भी भोग लगाना
संक्रांति-पोंगल सुसंस्कृति सहेजे,छिड़ा उमंग का नया तराना
बच्चे-बूढ़े करते पतंग बाज़ी,नव बसंत निश्चित है अब आना।
संक्रांति स्नान,करते शुभ दान,कान्हा सर्व खुशी बरसाना।
उषा चली संग भानु उत्तरायण,नीलम का भाग्य चमकाना।
नीलम शर्मा✍️

         

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