कुछ मुक्तक

मुक्तक
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कहीं मिलती नही मंज़िल कहाँ जाऊँ
नहीं दिखता मुझे साहिल कहाँ जाऊँ ।
उधर खींचे मुहब्बत औ इधर दुनियाँ
लिए टूटा हुआ ये दिल कहाँ जाऊँ ।।

कठपुतली सा रहे नचाती हमें नियति हर पल
नही जानते कहाँ मिलेगा भोजन घर या जल ।
माया ममता रहें खींचते सदा जगत की ओर
आत्म तत्व से करते रहते पंचभूत नित छल ।।

छलकता कृपा घट तुम्हारा न होगा
अगर साँवरे का सहारा न होगा ।
न थामेगा तब हाथ दुःखितों का कोई
जमाने में कोई हमारा न होगा ।।
————– ———डॉ. रंजना वर्मा

         

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