“मजदूर”…

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सुलगते जीवन को खुशियों के पास छोड़ने चले हैं ,
बेख़बर-सी ज़िंदगी को अपनी ओर मोड़ने चले हैं ।
हवामहल और ताजमहल क्या मुमकिन था इनके बग़ैर ?
ये मेहनत से हर शय की नींव जोड़ने चले हैं ।।
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अपने श्रम को बेचता हर वो इंसान मजदूर है ,
मेहनत करके पसीने निकालना इन्हें मंज़ूर है ।
हर लम्हा गौर से देखो तो एक ज़ंग के समान ,
मंज़िल भले दिखे दूर मगर श्रम में इनका नूर है ।।
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कोई कारीगर कोई नौकर तो कोई किसान हैं ,
हालातों से होते मज़बूर मगर अच्छे इंसान हैं ।
चाहे हजारों दुश्वारियाँ आ जाए राहों में मगर ,
जीवन-पथ पर डटे रहना इनकी पहचान हैं ।।
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कुछ के सपने पास तो कुछ के सपने दूर है साहब ,
अमीर मग़रूर दिखते तो गरीब मज़बूर है साहब ।
सभी काम का अपना एक अलग महत्व है ऐ “कृष्णा”,
हर एक अच्छे परिणाम के पीछे मजदूर है साहब ।।
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— °•K.S. PATEL•°
( 05/05/2019 )

         

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