नजर

घूरती हुई नजर इकरार सा करती है।
ढूँढती हुई नजर इन्तजार सा करती है।
ये दरमियाँ दिखे मोहब्बत की इन्तेहाँ है।
जो हर नजर को ही बीमार सा करती है ।
ड़ाॅ मीनू पाण्डेय

         

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