“अंतर्मन की आवाज़ “…

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अपनी अंतर्मन से आवाज़ क्यों निकलते नहीं…
पता नहीं आँखों में हसीं ख़्वाब क्यों पलते नहीं…?
देखा जहां में सपनों के घरौंदे को टूटते …
शायद यही वजह है कि सपने अब मचलते नहीं…??
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तलाशने पर सच्चे एहसास अब मिलते नहीं…
नई ख़्वाहिश की एक भी कोंपल अब खिलते नहीं…?
कहो ! कौन आकर पढ़ेगा मेरी मन की भाषा…
आजकल ये ज़ज़्बात भी तो कुछ सम्हलते नहीं…??
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ये क़मबख़्त एहसास कभी-कभी बदलते नहीं…
सच…कोई वज़ूद को छोड़कर कभी चलते नहीं…?
मगर ये ज़िंदगी का क़श्मक़श भी तो कुछ कम नहीं…
क्या बतायें ये पहेली कभी भी सुलझते नहीं …??
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आज निष्ठुर लोग “कृष्णा” बेवज़ह पिघलते नहीं…
स्वार्थ लिये बिना ख़बर से बाहर निकलते नहीं…?
अब साँस की लौ कब धीमी होगी मालूम नहीं…
मन की तरंगों में अब कोई लहर बनते नहीं…??
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