“उम्र भर”…

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हर उम्र में हर शौक़ हर किसी का बस बदलता रहा ,
पलकों तले हसीं ख़्वाब आहिस्ता से पलता रहा ।
मिल गया तो ज़हान की हर खुशी अपनी मुट्ठी में ,
और नहीं मिला तो मन बहुत ही बस मचलता रहा ।।
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हर शय से इश्क़ करने की इक ख़्वाहिश आज भी है ,
बदल मत जाये ज़ज़्बात , ये गुज़ारिश आज भी है ।
उम्र का दौर भले आहिस्ता-आहिस्ता गुजर रहा ,
मगर कुछ राहों में अनचाही बंदिश आज भी है ।।
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अभी क्या उम्र भर की तलाश होती रहेगी उम्र भर ?
या फिर से तड़पने की रह जायेगी कोई क़सर ?
वाकई मानो ज़िंदगी मृग-मरीचिका है देखो ,
उम्र बीत जायेगी , साथ न रात है न कोई सहर ??
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कुछ अफ़सोस रहेगा , जीवन में कुछ न करना हुआ ,
न अपनी न किसी और की झोली को न भरना हुआ ।
मगर इस बात की तसल्ली “कृष्णा” हमेशा होगी ,
कोई भी गलत काम कर पल-पल में न मरना हुआ ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 16/08/2018 )

         

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