आज फिर छेड़ता हूँ शाश्वत तान वही

आज फिर छेड़ता हूँ शाश्वत तान वही,
सुख-समृद्धि,धर्म,ज्ञान और विज्ञान वही,
सिंधु के जिजीविषा का सम्मान वही,
हिमालय के अविरल शरीर में प्राण वही,
हिन्द महासागर की लहरों का अभिमान वही,
खेत-खलिहानों में लहलहाता भगवान वही,
बुद्ध,महावीर,गाँधी से रत्नों का खान वही,
जालियाँवाला और चम्पारण का बलिदान वही,
लबों पे बसा गीता और कुरआन वही,
मंदिरों में बसा पत्थर और पाषाण वही,
मस्जिदों में गाया जाता अल्लाह का अजान वही,
दुर्गा और चंडी का झंझावात, तूफान वही,
जवानी में हिलोरे मारता जोशीला ऊफान वही,
लोकतंत्र के गौरव का सच्चा स्वाभिमान वही,
अर्जुन के गांडीव का तीक्ष्ण कमान वही,
दुश्मनों से लड़ता सीमा पर जवान वही,
प्रथम सभ्यता होने का खुद पे गुमान वही,
सर्वगुणसम्पन्न मेरा भारतवर्ष महान वही।

सलिल सरोज

         

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