कफन की ख़ाक

हमको अज़ीज़ ऐसे है अपने वतन की ख़ाक

जैसे अज़ीज़ होती है गुल को चमन की ख़ाक

मीठी ज़बां में अमन-ओ-सुकूँ का पयाम दे

सारे जहां से अच्छी है गंग-ओ-जमन की ख़ाक

सोए हैं जो शहीद तिरंगे को ओढ़ कर

है ख़ुशनसीब कितनी ही उस पैरहन की ख़ाक

ख़ुशबू मिलेगी एक सी हो रंग-ए-गुल कोई

माना कि हमने है जुदा हर इक सुमन की ख़ाक

जो भी वतन की राह में क़ुर्बान हो गए

महिका करेगी उनके हमेशा कफ़न की ख़ाक

एहसास हमको होता है जैसे कि सुबह-ओ-शाम

हमको बुला रही हमारे है वतन की ख़ाक

मर कर इसी ज़मीन में मिलते हैं साद हम

जब भी हमारी रूह उतारे बदन की ख़ाक

अरशद साद रूदौलवी

         

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