केसरिया लहराता है

खून से सींची धरती पर
अपना आधार बनाता है।
बहती हवा में भारत वर्ष की
गौरव गाथा गाता है।
आसमान के सीने पे बेधड़क
सूरज सी चमक दिखाता है
त्याग, बलिदान का प्रतीक
बनके केसरिया लहराता है।

केसरिया ने हर रण देखा है।
मोक्ष का अंतिम क्षण देखा है।
धर्म का जै जैकार सुना है।
दुश्मन की ललकार सुना है।
शिव तांडव और कृष्ण रास दिखा है।
अपने हाथों इतिहास लिखा है।
वीरों के अर्पित रक्त से माथे
तिलक लगाता है।
त्याग, बलिदान का प्रतीक
बनके केसरिया लहराता है।

याद है राणा प्रताप केसरी।
अशोक पश्चयताप केसरी।
याद है चन्द्रगुप्त मौर्य केसरी।
केसरी पद्मावती रानी थी।
केसरी गोरा की कुर्बानी थी।
याद है हर तलवार केसरी।
नीले गगन पे धार केसरी।
लक्ष्मीबाई और शिवाजी की
कुर्बानी याद दिलाता है।
त्याग, बलिदान का प्रतीक
बनके केसरिया लहराता है।

जिसने डर को जीत लिया
केसरिया वो निडर मन भी है।
समर्पित हुआ जो हँसते हँसते
केसरिया उसका तन भी है।
जो भी इस केसरिया के
रंग में रंग जाता है।
शीश तली पे धर करके
रण मे उतर जाता है।
त्याग, बलिदान का प्रतीक
बनके केसरिया लहराता है।

         

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