चुनावी दौर और हमारा व्यवहार

चुनावी दौर आ गया, जो “राम और रहमान” रोज एक साथ हँसते बोलते रहे थे और रहेंगे, वो चुनावी मौसम में एक दूसरे के विरोध में आग उगलने शुरू कर दिए है…..
अब दोनो आपस मे क्या हो गए है,बस इसी कठवी हक़ीक़त को शब्दों में ढालने की कोशिश की है…..

मैं न एक इंसा हूँ , न तू एक इंसा है।
मैं बस इक हिन्दू हूँ तू एक मुसलमा है।।

रोजाना मिलते है हम भाई के जैसे,
मैं तेरा रहनुमां हूँ तू मेरा रहनुमां है।।

जब भी आता देखो मौसम ये चुनावी है,
मैं हुआ बदज़ुबा हूँ ,तू हुआ बदज़ुबा है।।

मैंने पूंछा सबसे नफरत ये मिटे कैसे,
मैं हुआ बेजुबां हूँ , तू हुआ बेजुबां है।।

हम छोड़ ये झगड़ा दे, बस बने रहे इंसा,
ये मेरा अरमां है क्या तेरा अरमां है।।

अवनेश कबीर✍

         

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