बहुत फर्क है तुम में मुझमें

 

मैं धीर प्रकृति का पर्वत सा
तुम टुकड़ो जैसे इतराते हो
मैं गहरा सा एक समंदर हूँ
तुम एक नदिया से बलखाते हो
*बहुत फर्क है तुम में मुझमें*

मैं चोट नहीं पहुंचाता हूँ
पर तुम गोली बरसाते हो
नादान समझ मैं चुप रहता
तुम फिर भी आँख दिखाते हो
**बहुत फर्क है तुम में मुझमें**

जब एक कमी पे वार किया
तो अब कैसे खिसियाते हो
तुमने पाले आतंकी खुद
उलटे मुझपे गुर्राते हो
*बहुत फर्क है तुम में मुझमें*

जब मैं भी थोड़ा खड़ा हुआ
तब जान हलक में आ जाती
जब ठोकर पर हम रखते हैं
देखो कैसे रिरियाते हो
*बहुत फर्क है तुम में मुझमें*

है नस्ल तुम्हारी बेशर्मों की
यूं ही हरदम भरमाते हो
कहते हो युद्ध नही हल है
पर गोले भी बरसाते हो
*बहुत फर्क है तुम में मुझमें*

अब और नहीं ठग पाओगे
उल्टी मुंह की अब खाओगे
जब शेर सामने आ जाता
फट से गीदड़ बन जाते हो
*बहुत फर्क है तुम में मुझमें*

#जयहिन्द

         

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