बोस की ललकार

निर्बलों को सबलता का गीत मैं सुनाता हूँ
रास्ते के पत्थरों से रास्ता भी बनाता हूँ
संचित हुई अंतर शक्ति से शब्द संजोकर
सुप्त पड़ी चेतना को फिर से जगाता हूँ

गुलामी में जीना तो है मृत्यु स्वाभिमान की
स्वंतंत्र सोच ही प्रथम निशानी है इन्सान की
स्वतन्त्र सोच से ही आजादी का स्वपन सजेगा
फिर जन जन की आवाज में इन्कलाब गूंजेगा

बस तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूँगा
आज मेरे ढृढ संकल्प से निकला ये नारा है
बलिवेदी पर भी हंस कर, होगा वो समर्पित
जिस जिस को भी भारत जान से प्यारा है

वीरता और त्याग के पथ पर साथ चलेंगे तो
देश की आजादी के सूरज की खोज होगी
गुलामी की जंजीर की जालिम जकड़न से
मुक्त कराती ,फिर आजाद हिन्द फौज होगी

आजादी से सर्व समाज प्रफुल्लित होने से
देश की प्रगति का मार्ग ना अवरूद्ध होगा
और अंग्रेज हकूमत भी थर थर कांप उठेगी
जब कर्मयोगियों के हाथों से धर्मयुद्ध होगा

         

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