महाराणा प्रताप को शत शत नमन

मेवाड़ की हवा भी करे सदा जिसका वन्दन
उस वीर महाराणा प्रताप को शत शत नमन
नमन उनके संस्कार को, और शस्त्र ज्ञान को
नमन धर्म रक्षा को और उनके स्वाभिमान को
धैर्य का पहाड़ कहूँ या कहूँ उन्हें महान दानवीर
रोज रोज कहाँ पैदा होते है जग में ऐसे शूरवीर
हृदय में उनके काव्य का ,सदा प्रवाहित सेजल था
पराक्रम और काव्य रचनात्मकता का सुमेल था
साहस का समन्दर थे वो ,ना डर किसी बात का
अकबर भी न झुका पाया सर राणा प्रताप का
अदम्य थी उनकी वीरता व उज्ज्वल थी कीर्ति
उनके चेतक अश्व की रफ्तार, हवा को भी चीरती
देशभक्ति भी उनकी ,पत्थर की अमिट लकीर थी
तभी उन पर मर मिटने वालों की बड़ी भीड़ थी
अचल और वन के दुर्गम मार्ग में भी राह देखते
मुगलों से मेवाड़ मुक्त कराने की बस चाह देखते
राजपूत योद्धा तो बस तलवार चलाना जानते थे
भले रणभूमि मृत्यु हो, ना शीश झुकाना जानते थे
साधन चाहे कम थे, पर भुजाओं में अजब बल था
अति विषम परिस्थितियों में भी अडिग मनोबल था
जन्मभूमि पर सर्वस्व, अर्पित किया अधिकार से
अदभुत साहस दिखाया हल्दी घाटी की टकरार में
अकबर मुगल सम्राट तो राणा, तलवार दो धारी थे
बीस हजार सैनिक, शत्रु के पचास हजार पर भारी थे
विरोधीयों की औरतों को जिसने सम्मान से लौटाया
आखिर एक लम्बी बीमारी ने राणा प्रताप को हराया
मरते दम तक राणा ने शौर्य का परचम लहराया था
उस योद्धा की मृत्यु से अम्बर तक शोक छाया था
गुलामी भरी मानसिकता न जाने कब हम छोड़ेंगे
कब हम किताबों में राणा जैसे वीरों के पन्ने जोड़ेंगे

         

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