मेरी कलम

मैं भी प्रणय सिंधु में सिंचित,
शब्द भाव रच सकती हूँ,
उर तंत्रों को झंकृत कर दे,
सुभग कुमुदिनी बन सकती हूँ।
मेरे गीतों से भी यौवन,
पिय की याद दिला सकता है,
तरुणाई भी स्वप्न संजो ले,
ऐसी अनल जगा सकता है,
पर श्रृंगार ही रचते रहकर,
सृजन पूर्ण न हो सकता,
राष्ट्र धर्म यदि लिखा नहीं तो,
सार्थक कवि नाम न हो सकता,
कूड़े करकट में स्वप्न ढूंढने,
नौनिहाल जुट जाता हो,
बेटी की शादी की खातिर,
बाबुल का घर बिक जाता हो,
आरक्षण और धर्म के बूते,
जहाँ वोट उगाहे जाते हो,
प्रतिभा पलायन कर जाती हो,
जहाँ फेल,पास हो जाते हों,
जिसकी लाठी भैंस भी उसकी,
पंक्ति सत्य जब होती है,
बेटी जब तक घर ना आ जाये,
माँ भय से कंपित रहती हो,
इस अवसर पर मेरी कलम ये,
दिव्य अस्त्र की भांति सजेगी
सम्बल बन के शोषित जन का,
शोषक का प्रतिघात करेगी,
चाटुकारिता करते रहना,
कवि का यह तो धर्म नहीं है,
अन्याय पर आंख मूंद ले ,
कवि का यह तो कर्म नहीं है,
सत्य लिखा है सत्य लिखेगी,
जन जन की आवाज बनेगी,
बनकर दीपक अंधियारे में,
रोशन हर घर द्वार करेगी
वर्षा श्रीवास्तव”अनीद्या”

         

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