रावण कैसे मारोेगे

कूड़ा करकट जमा कर लिया , फिर पुतले बनवाएँगे ।
नए जमाने के रावण से , फिर रावण जलवाएँगे ।।
कब तक कुत्तों बालाओं की गोलाई को ताड़ोगे ।
रावण खुद के अंदर है , तुम रावण कैसे मारोगे ।।१।।

गली मोहल्ले चौबारों में , जय श्री राम की बोलोगे ।
किसी के घर की इज्जत को , फिर तुम नजरों से तौलोगे ।।
कब तक गैरों की बीबी पर , यूं ही नजरें डारोगे ।
रावण खुद के अंदर है , तुम रावण कैसे मारोगे ।।२।।

सब अपने मन के राजा हैं , सबका अपना टेस्ट है ।
आज के रामों से अच्छा तो , कल का रावण श्रेष्ट है ।।
काम क्रोध लोभ माया को , कैसै तुम संहारोगे ।
रावण खुद के अंदर है , तुम रावण कैसे मारोगे ।।३।।

“साहिल ” कभी न कहता तुमसे , कि जाकर के बुद्ध बनों ।
बस इतनी चाहत है मेरी , कि तुम मन से शुद्ध बनो ।।
भाईचारे राष्ट्रवाद से , सबकी लाइफ संवारेंगे ।
मन के सारे पाप मिटाकर , हम रावण को मारेंगे ।।४।।

न वायु प्रदूषण होगा , पुतले न जल पाएंगे।
हर विजयादशमी को फिर हम , दिल में आग जलाएंगे ।।
माँ भारती के वीर पुत्र , जब एक साथ हुंकारेंगे ।
दिल में सबके देशप्रेम हो , तब हम रावण मारेंगे ।।५।।

रचनाकार
गजेन्द्र मेहरा ‘साहिल’
गाडरवारा (म.प्र.)

         

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