वतन खतरे में हैं

ये ज़मीं ख़तरे में है सारा गगन खतरे में है।
एक कोना ही नहीं पूरा वतन ख़तरे में है।

हर तरफ़ फैली है नफरत हर तरफ दंगा फसाद,
भाईचारा मिट गया चैनो -अमन ख़तरे में है।

सामने मंजिल के आके आँधियों में घिर गए
रहनुमा कोई नहीं है हर चलन खतरे में है।

वक्त कितना बेरहम है लूट रक्खा है सुकूँ,
हर किसी की आँख नम है हर सदन खतरे में है।

आज सड़कों पर बिका है पेट की खातिर कोई,
बेहया रहबर हुये हैं हर बदन खतरे में है।

रोज़ ही फितने जगा कर लूटता है जो सुकूँ,
कौन वो शैतान है, जिस से वतन ख़तरे में है

‘राज’ रक्षक ही बने भक्षक यहां पर अब सुनो,
हर कली खतरे में है गंगो -जमन खतरे में है।
——राजश्री——

         

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