वन्दे-मातरम् नहीं गाना है

अपने हितों के लिए देश को लजा रहे जो,
ऐसे क्रूर कमियों को ज़िन्दा दफ़नाना है l

रहना है हिन्द में तो माटी के पुजारी बनो,
अन्यथा विकट यहाँ सांसों का समाना है l

वंदना जो माटी की न कर सका इस लोक,
उस लोक में भी नहीं उसका ठिकाना है l

हिन्द की धरा पे उसे करेंगे उसे सहन नहीं,
जो भी कहे वन्दे मातरम् नहीं गाना है l

………………………..- सुनील गुप्त ‘विचित्र’

         

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