वतन से प्रेम जो होता

एक रचना सादर समिक्षार्थ,,,,,,,

*शमा कुछ और ही होता*
*वतन से प्रेम जो होता*

अगर थोड़ा सा भी हमको वतन से प्रेम जो होता
न कोई फर्श पे सोता,न कोई भूख से रोता ।।

गिरा के हम दीवारों को
अमीरी और गरीबी की
कदम अपना बढ़ा करके
गले उनको लगा लेते ।।

न यूँ बचपन किसी का फिर कचरे के ढ़ेर में खोता
अगर,,,,,

भ्रष्टाचार आतंक का
बिगुल हमने बजाया है
न दुनिया पहले ऐसी थी
जिसे हमने बनाया है

की होती हर तरफ खुशियों अमन से प्रेम जो होता

न कोई फर्श पर सोता
न कोई भूख से रोता
अगर थोड़ा सा भी हमको वतन से प्रेम जो होता ।।

         

Share: