शहीद

छुट्टी पर घर आने का वादा करके वो सरहद पर जाता है।
क्या गुजरती है उसकी माँ पर जब तिरंगे मे लिपटा हुआ वो घर आता है।

जिस आँगन मे वो बचपन मे माँ की गोद में सोता है।
आज उसकी खामोशी देख आंगन का पत्थर भी रोता है।

अभी कुछ दिन पहले मांग सजी थी और मेहंदी सजी थी हाथो की।
चूड़िया टूटती दिखती है उसकी दुल्हन के मेहंदी वाले हाथो की।

बहनो की चीखे तब आसमान को भी चीर जाती है।
भाई की कलाई पर जब आखिरी बार राखी बांधी जाती है।

उसके बचपन के साथी का भी सीना छलनी होता है।
और वो शहीद की छाती पर लेट फूट फूट कर रोता है।

लाखो शहीदों ने हमारी सुरक्षा की बड़ी भारी कीमत चुकाई है।
हमारे बगीचे की हरियाली किसी माँ के कलेजे के खून से आई है।

         

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