सीधा ही संग्राम करो

न स्वागत न सत्कार करो ।
अब तो बस प्रतिकार करो ।

बहुत हुआ खेल आँख मिचौली का ,
शत्रु से अब सीधा ही संग्राम करो।

इन कूटनीति के वादों से ,
इन उलझे आधे से वादों से ।

अब तनिक नहीं विश्वास करो ,
शत्रु से अब सीधा ही संग्राम करो ।

कब तक गिनते गिनवाते जाओगे,
एक के बदले दस दस लाओगे ।

नाम रहे न विश्व पटल पर ,
अब ऐसा कोई इंतज़ाम करो ।

पा सम्पूर्ण विजय विश्राम करो ,
शत्रु से अब सीधा ही संग्राम करो।

……विवेक दुबे “निश्चल”@….
Blog post 19/3/18

         

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