कच्ची माटी

नई ऋतु ,नया जीवन नई- नई सी आशाएं
अभी छाव में हो तुम बालक ,
नई तुम्हारी इच्छाये।
जीवन में अब तक तुमने ,
दर्द की ‘धुप’ कहाँ अनुभव की है ?
अभी कहाँ इन ,’तृष्णाओंने’,
सोच तुम्हारी, परखी है।
अभी बरसती तुम पर ममता ,
कहाँ सही तूने गर्मी !
नही तपे तुम, अभी आग में
कुंदन होना बाकि है।
कच्ची माटी का एक घड़ा हो ,
अनुभव में पकना बाकि है ।
अभी तुम्हारे भोले मन पर ,कहाँ सोच की रेखाये ,
अभी तुम्हारे हाथो पर भी धोखो के,
छाले पड़ना बाकि है ।
सरल ह्रदय हो कहाँ जानते तुम स्वार्थ की परिभाषा
अभी ह्रदय की चंचलता का,
दूषित होना बाकि है ।
अभी कहाँ समझे तुम छल को
ह्रदय टूटना बाकि है ।
ओ मेरे मासूम, फ़रिश्ते !अभी तुम्हारा समय नही ,
अभी तुम्हे अपने ही गम में,
डूब के बचना बाकि है।
shikha naari

         

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