अंडा चोर

अंडा चोर
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उस दिन भी चुनचुन चिड़िया के अंडे गायब हो गये । वह बेचारी ची ची करती , रोती-बिलखती इस डाल से उस डाल पर फुदकती सारा पेड़ सिर पर उठाए थी । सैकड़ों साल पुराने उस शीशम के पेड़ पर जैसे तूफान आया हुआ था । इससे पहले भी कई चिड़ियों के अंडे इसी प्रकार गायब हो चुके थे । बहुत ढूंढने पर भी न ही अंडे वापस मिले और न चोर का ही कुछ पता चला ।
सारे पक्षी हमेशा की तरह सूरज की पहली किरण फूटते ही अपने बच्चों और अंडों को छोड़ कर चारे की तलाश में निकल पड़ते और अधिकतर शाम होने पर लौटते । जिनके बच्चे बहुत छोटे थे वह बीच-बीच में आकर अपने बच्चों को चारा खिला जाते । शाम होने पर जब सब पक्षी वापस लौटते तो अक्सर किसी न किसी पक्षी के अंडे गायब मिलते ।
पक्षीराज गरुड़ ने जब चूं चूं चिड़िया के अंडे के गायब होने की बात सुनी तो वे बहुत चिंतित हो गए । वे पिछले सात वर्षों से उस पेड़ पर रहने वाले सभी पक्षियों के स्वामी थे । इससे पहले ऐसी घटनाएं कभी नहीं हुई थीं । इधर दो सप्ताह से उनके वृक्ष पर नित्य ही चोरियां होने लगी थी ।
पक्षीराज ने तुरंत चूं चूं को बुलाकर पूछा –
“चोरी कब हुई ?”
“मैं नहीं जानती । मैं तो….. मैं तो जब सारा चुग कर अभी थोड़ी देर पहले लौटी तो घोंसले में अंडे नहीं थे ।” चूं चूं ने रो-रो कर बताया ।
उसे समझा बुझा कर चुप कराने के बाद पक्षीराज ने अन्य पक्षियों को भी बुला कर उनसे पूछताछ की लेकिन कुछ पता न चला । अब उन्होंने एक सुरक्षा समिति बनायी । समिति में पाँच पक्षी थे । इनका काम सब चिड़ियों के चले जाने पर बारी-बारी से वृक्ष पर पहरा देना था ।
दूसरे दिन से ही उन्होंने पहरा देना आरंभ कर दिया । पहले दिन बगुले की बारी थी । वह सारे दिन वृक्ष की सबसे ऊंची डाल पर बैठकर चौकस निगाहों से चारों ओर देखता रहा । शाम को सभी पक्षियों ने अपने अंडे सही सलामत पाए ।
इसी प्रकार दूसरे तीसरे और चौथे दिन सारस गिद्ध और गौरैया ने पहरा दिया पर कोई घटना नहीं घटी । पांचवें दिन कौए कृष्ण वर्ण की बारी थी ।
वह सवेरा होते ही पेड़ की सबसे ऊंची फुनगी पर जा पहुंचा । सभी पक्षी हमेशा की तरह ची ची करते अलग-अलग दिशाओं में उड़ गए । कृष्णवर्ण अकेला रह गया । बहुत देर तक ऊपर बैठा वह सावधानी से चारों ओर देखता रहा लेकिन जब कोई विशेष बात नहीं दिखाई दी तो वह ऊब गया । इस डाल से उस डाल पर फुदक फुदक कर वह कुछ देर खेलता रहा फिर थक कर अपने घोंसले में जाकर सो रहा ।
कृष्णवर्ण न जाने कितनी देर तक सोया । अचानक एक अजीब सी सरसराहट की आवाज से उसकी नींद खुल गई । वह तुरंत सावधान हो गया । घोसले से थोड़ी सी गर्दन बाहर निकाल कर उसने इधर उधर देखा पर घने पत्तों में कुछ दिखाई नहीं दिया । वह आहिस्ते से घोंसले से बाहर निकल आया । थोड़ी देर इधर-उधर तलाश करने के बाद अचानक वह ठिठक गया । उसने देखा कि एक काला भयंकर सर्प धीरे-धीरे रेंगता हुआ एक डाल से लिपटा श्वेतांक कबूतर के घोंसले की ओर बढ़ रहा था । कृष्णवर्ण पहले तो उस सर्प को देखकर डरा । फिर उसे अपने कर्तव्य का बोध हो आया । वह सर्प से कुछ दूर ऊंची डाल पर बैठ कर जोर जोर से चिल्लाने लगा । कौवे की कांव कांव सुन कर सर्प ने कृष्णवर्ण की ओर देख कर गुस्से से फन उठाया और उसकी ओर फुफकार छोड़ी तो वह डरकर उड़ गया । सर्प ने आराम से श्वेतांक कबूतर के घोंसले में मुंह डालकर उसके सारे अंडे खाए और मस्ती से रेंगता हुआ पेड़ से उतरकर घनी झाड़ियों में घुस गया ।
कृष्णवर्ण बेचैनी से पक्षियों के वापस लौटने का इंतजार करने लगा । उनके लौटने पर उसने पक्षीराज गरुड़ के पास जाकर पूरी घटना कह सुनाई । सर्प की करतूत और उसकी धृष्ठता की बात सुनकर गरुण क्रोध से भर गया । उसने तुरंत सुरक्षा समिति के सदस्यों को आज्ञा दी –
“सब मिलकर जाओ और उस सर्प को उसकी करनी का फल दे दो । ”
पांचों पक्षी झाड़ी के पास जाकर उसे ढूंढने लगे । बहुत ढूंढने के बाद उन्हें एक बिल दिखाई दिया । सर्प बिल मे था और उसकी पूंछ का कुछ भाग बिल से बाहर निकला दिखाई दे रहा था ।
पांचों पक्षी बिल के पास जाकर शोर मचाते हुए उसे बाहर निकलने के लिए ललकारने लगे । जब बहुत देर चीखने चिल्लाने पर भी वह बाहर नहीं निकला तो बगुले ने क्रोध में आकर उसकी पूंछ में चोंच मार कर उसे घायल कर दिया ।
चोट खाकर सर्प फुफकारता हुआ बाहर निकला और जोर-जोर से फुफकारने लगा । उसकी जहरीली फुफकार से गौरैया और बगुला वहीं गिर पड़े । उन्हें मरा देखकर अन्य पक्षियों ने गरुण के पास जाकर सर्प की शक्ति के संबंध में बताया । गौरैया और बगुला के मरने का समाचार सुनकर गरुण के क्रोध की सीमा न रही । वह तुरंत ही वहां जा पहुंचा ।
सर्प उस समय बगुले की गर्दन मुंह में दबाए हुए था । गरुड़ ने झपट्टा मारकर सर्प की गर्दन अपने पंजों में दबोच ली और आकाश में उड़ गया । उसके नाखूनों ने सर्प को लहूलुहान कर दिया । गर्दन दबी होने के कारण वह पूरी तरह विवश हो गया था ।
पर्वत की ऊंची चोटी पर बैठकर गरुड़ ने सर्प के टुकडे टुकडे कर डाले । अपनी पक्षी जाति पर हुए अन्याय और सर्प की नीचता के कारण गरुड़ का क्रोध इतने पर भी शांत नहीं हुआ । वह अब भी सर्प को देखते ही उस पर झपट पड़ता है और उसे मार डालता है ।
उसके बाद फिर कभी किसी पक्षी के अंडों की चोरी नहीं हुई ।
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