दो की लड़ाई

दो की लड़ाई
——————
– डॉ. रंजना वर्मा

बहुत दिन पहले की बात है । नर्मदा नदी के किनारे मल्लाहों की एक बस्ती थी । उस बस्ती में एक मछुआ और एक मछुई रहते थे । मछुआ बहुत सीधा और परिश्रमी था । मछुई कामचोर और झगड़ालू थी ।
मछुआ रोज सवेरे उठकर जाल लेकर नदी की ओर चला जाता । सारे दिन वह मछलियां पकड़ता रहता । शाम होने पर वह उन्हें ले जाकर बाजार में बेच देता और जो पैसे मिलते उनसे आटा , नमक और साग सब्जी लेकर घर आ जाता । मछुई सारे दिन घर में पड़ी रहती । जब मछुआ शाम को सामान खरीद कर घर लौटता तब वह उससे सारा सामान ले लेती और सामानों में मीन मेख निकालने लगती ।
कभी कहती – आटा कम है तो कभी साग-सब्जी कम होने की शिकायत करती । कभी इस बात को लेकर लड़ने लगती कि मछलियां बहुत कम दामों में बेच दी । और कुछ नहीं तो वह अपनी गरीबी का रोना रोने लगती ।
मछुआ चुपचाप सब कुछ सुन लेता । बकझक कर मछुई खाना बनाने लगती । कुल आटे की वह छह रोटियाँ बनाती और साग के साथ तीन रोटियाँ मछुए को परोस देती । बाकी तीन रोटियाँ वह खुद खा लेती ।
एक दिन की बात है । मछुए ने हाट जाकर जब मछलियां बेची तो एक बड़ी मछली बच गई । उसने सोचा – चलो आज मछली का ही सालन खाया जाये । नमक , मसाला , आटा खरीद कर वह घर पहुंचा तो मछुई ने उसे खूब खरी खोटी सुनाई ।
आधी मछली और तीन रोटियां उसने मछुए के सामने रखी तो वह बोला –
” सुन री , आज मै चार रोटियाँ खाऊँगा ।”
” क्यों ? चार क्यों खाओगे ? तुम चार रोटियाँ खाओगे और मैं दो ? नहीं ,ऐसा नहीं हो सकता ।”
” तू तो कुछ भी नहीं करती । बस सारे दिन पड़ी रहती है । शाम को रोटियाँ भर पका लेती है । में सारे दिन मेहनत करता हूँ तब कहीं जाकर चार पैसा मिलता है । आज तो मैं चार रोटियाँ ही खाऊंगा । आज तू दो रोटी खा ले । ” मछुआ बोला ।
“नहीं । मैं तो तीन ही रोटियाँ खाऊँगी ।” मछुए भी जिद पर अड़ गयी । और बस दोनों अपनी अपनी बात पर अड़े रहे ।बातें करते करते दोनों लड़ने लगे । छीना झपटी और फिर मारपीट तक नौबत आ गई ।
अंत में मछुए ने कहा –
” लड़ती क्यों हो ? मैं सच और न्याय की बात कर रहा हूँ । नहीं मानती चल कर मुखिया जी से पूछ लो ।”
मछुई मान गयी । रोटियाँ वहन छोड़ कर दोनों मुखिया के पास पहुंचे । मुखिया ने दोनों की बातें ध्यान से सुनी फिर मछुए को समझाते हुए बोले –
” देखो भाई ! मछुई तुम्हारी पत्नी है । लड़ाई करना ठीक नहीं है । दोनों बराबर बराबर बांट कर खा लो ।”
मछुआ कहने लगा –
“मुखिया जी ! सारे दिन मेहनत तो मैं करता हूं । क्या एक दिन भी मैं चार रोटियाँ नहीं खाऊं ? आज मैं चार रोटियाँ ही खाऊंगा ।”
तब मुखिया ने मछुई से कहा –
“तुम बहुत समझदार स्त्री हो । आपस में इस तरह लड़कर तमाशा करना अच्छी बात नहीं है । मछुआ थका मांदा है । मेहनत भी वह तुम से अधिक करता है । आज तुम दो रोटियां खा लो । उसे ही चार रोटियाँ खा लेने दो । एक ही दिन की तो बात है ।”
” नहीं मैं दो क्यों खाऊं ? मैं तो तीन ही रोटियाँ खाऊंगी । बराबर बराबर ।” मछुई ने गुस्से से उत्तर दिया ।
दोनों को अपनी जिद पर अड़ा देखकर मुखिया ने कुछ सोचते हुए कहा –
“अच्छा , ठीक है । तुम रोटियां ले आओ । मैं फैसला किये देता हूँ ।
रोटियाँ लेने के लिये मछुए मछुई अपनी झोपड़ी की ओर लौटे । अभी वे झोपड़ी के द्वार तक ही पहुंचे थे कि तभी एक बंदर झपटकर सारी रोटियां उठा ले गया । दोनों एक दूसरे का मुंह देखते रह गए । झगड़े के कारण उन्हें एक रोटी भी खाने को नहीं मिली । अंत में उन्हें आधी आधी मछली खा कर ही संतोष करना पड़ा ।
सच है – दो की लड़ाई में हमेशा तीसरे का ही फायदा होता है ।
**** – **** – **** – ****

         

Share: