“हिन्दी है तो भारत है”

“हिन्दी है तो भारत है”

भारत के संविधान के अनुच्छेद 343(1) के अनुसार संघ की राजभाषा हिंदी एवं लिपि देवनागरी है तथा अनुच्छेद 351 के तहत हिंदी भाषा के विकास के लिए एक विशेष निदेश किया गया है।संविधान के अनुसार हिंदी में काम करना हमारा महती दायित्व है। हिंदी सिर्फ भाषा ही नहीं है बल्कि यह भारतीय संस्कृति की वाहक भी है । देश के प्रायः सभी हिस्सों में बोली और समझी जाने वाली हिंदी अब विश्व पटल पर भी छा गई है । आज 140 देशों में हिंदी धड़ल्ले से इस्तेमाल होती है और यह एक अरब 20 करोड़ से अधिक लोगों की समझ में आने वाली भाषा है। हिंदी को महज आमजन की बोलचाल मानना भूल होगी । इसमें अनंत संभावनाएँ छिपी हुई हैं। बस, हमें अपनी आँखों से पट्टी हटाकर आगे चलना है । हिंदी को आगे बढ़ाने का दायित्व सिर्फ सरकार का नहीं है बल्कि सभी नागरिकों का है ।
हालांकि, मौजूदा परिस्थितियों पर गौर करें तो पता चलता है कि हम अंग्रेज़ी के इस तरह पिछलग्गू बन गए हैं कि भारतीय भाषाओं के समक्ष धीरे-धीरे अस्तित्व का संकट पैदा होता जा रहा है । इस दौर की विचित्र विडंबना है कि हिंदी भाषी या अन्य भारतीय भाषा-भाषी क्षेत्र के लोग बड़े गर्व के साथ यह कहते हुए मिल जाते हैं कि उन्हें हिंदी या अन्य भाषा ठीक से नहीं आती है जो कि उनकी मातृभाषा है। अगर समय रहते सचेत नहीं हुए तो भाषा मरणासन्न की स्थिति में आ जाएगी और भारत विघटन के तकलीफ से एक बार फिर रू-ब-रू होगा।
किसी भी भाषा का विकास एकाएक नहीं होता है । यह क्रमिक विकास का परिणाम होता है ।आवश्यकता के मुताबिक शब्द गढ़े जाते हैं। नई परम्पराएँ बनती हैं,जो आगे चलकर हमारी संस्कृति में समाहित हो जाती है ।पर परंपराओं के टूटने और शब्दों की टीस उभर आती है । भारत के अमर रहने के लिए हिन्दी का जिंदा रहना परमावश्यक है।

धन्यवाद

सलिल सरोज
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