उसकी खुशी

वो तड़प उठी जब लगाए गए उस पर पहरे क्योंकि वो एक बेटी थी और पिता ने कहा तुम मेरी इज़्ज़त हो, और वो रहने लगी ख़ुशी ख़ुशी अपने पिता की मर्ज़ी के मुताबिक़ जैसे रहती आई थी
वो तड़प उठी जब पति ने कहा तुम करती ही क्या हो दिन भर, और वो आँखों में आंसू लिए फिर पिसने लगी ज़िन्दगी के पाटों में रोज़ाना की तरह
वो तड़प उठी जब बच्चों ने कहा की हम तुम्हारा बोझ नहीं सम्हाल सकते, और वो उदास सिसकती पड़ी रहने लगी इक कोने में मजबूर सी

लेकिन क्यूँ … वो तो भूल गई थी खुद को अपनों के लिए, सब कुछ तो सोंप दिया था उसने, वो भी तो इंसान है
अरे ….हाँ वो तो खुद भूल गई की वो इंसान है, भूल गई थी की उसकी अपनी भी कोई ज़िन्दगी है, उसकी भी तो पसंद थी, लेकिन उसने तो अपनी सारी ख्वाहिशें न्योछावर कर दी थी औरों की ख़ुशी के लिए और उसकी अपनी ख़ुशी ?.. क्या किसी ने कभी उसके लिए सोचा , नहीं .. नहीं और अब उसके आखरी वक़्त अब तो उम्मीद की कोई किरन भी नहीं उसके पास तो क्या उसे हमेशा ऐसे ही सहते रहना होगा …..?

         

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