महिला-दिवस का महत्त्व व सार्थकता

महिला-दिवस का महत्त्व व सार्थकता
अन्य देशों की तरह भारत में भी हर वर्ष 8मार्च को महिला-दिवस मनाया जाता है।
बीता हुआ इतिहास औरतों के संघर्ष की दास्तान से भरा हुआ है । इसका इतिहास बहुत साल पुराना हैं। ऐसा कहा जाता है कि सर्व प्रथम 8 मार्च 1857 में भारत में जब गदर चल रहा था उसी समय अमेरिका में कपड़ा मिल मालिकों के खिलाफ अपने अधिकारों को लेकर महिला मजदूर काम बंद कर सड़कों पर उतर आईं।यह संघर्ष वक्त के साथ गहराता गया।मुख्य रूप से बीसवीं सदी में महिला दिवस का विचार प्रस्फुटित हुआ। सन् 1911में सर्वप्रथम महिला- दिवस के अवसर पर “स्वाधीनता, समानता और बंधुत्व” का नारा देते हुए वार्सलीज में प्रदर्शन किया गया।1915 में आठ मार्च को यूरोप के कई देशों में महिला-दिवस मनाया गया व पीट्सबर्ग में ‘ राबोनीत्सा’ नाम से एक पत्रिका निकाली गई।सन् 1970 में यह अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस आंदोलन के दूसरे चरण का साक्षी बना वहीं सन् 81 में महिला इतिहास सप्ताह का पूरे संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में विस्तार हुआ। महिलाओं का यह संघर्ष ‘ रोटी, समान मजदूरी व न्याय’ के लिए था।
बीता इतिहास महिलाओं के सुखचैन व शांति के लिए संघर्ष की दास्तान से भरा पड़ा है।किन्तु आज हालात और भी बदतर हो रहे हैं। युवा लड़कियों की बात क्या करें बच्चियां व बूढी महिलाएं भी सुरक्षित नहीं हैं ।बच्चियाँ अपने घर में भी सुरक्षित नहीं हैं ।दहेज-हत्या व बलात्कार के मामले भी कम नहीं हो रहे हैं ।दोहरी मानसिकता के पुरुष एक तरफ तो मंदिर में महिला को देवी के रूप में पूजते हैं और दूसरी तरफ सिर्फ अपनी यौन संतुष्टि व मनोरंजन के लिए उस पर गिद्ध-दृष्टि जमाये रहते हैं ।
ऐसे हालातों में महिला-दिवस का महत्त्व और बढ जाती है।लेकिन इस दिन सिर्फ जुलूस निकालना व भाषणों आदि से कुछ नहीं होने वाला है।ये रस्मी बातें छोड़ कर इस दिन विभिन्न देशों की महिलाओं को एकत्र हो कर गम्भीर रूप से नए सिरे से अपने अधिकारों व नीतियों पर विचार करने की आवश्यकता है।बदले हुए समाज को देखते हुए अपनी नीतियों में भी बदलाव लाना जरूरी है।आधुनिक वेश भूषा से ही नहीं, महिलाओं को ये साबित करना होगा कि वो किसी से कम नहीं तथा तय किया जाए कि समूचे विश्व में महिलाओं की स्थिति , चुनौतियों व प्रगति का मूल्यांकन किया जाए तभी महिला दिवस की सार्थकता है।
—राजश्री—

         

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