किशोरावस्था और मानसिक तनाव

*किशोरा अवस्था में मानसिक तनाव के कारण*
किशोरा अवस्था :– बच्चे बच्चे न रहे, नहीं वे बड़े हुए।
तो ,,,,
ये समय हर लड़के ,लड़कियों के लिए महत्वपूर्ण शारीरिक विकास का काल होता है।
जिस समय अनेक शारीरिक बदलाव से स्वयं जहाँ वह अंदरूनी रूप से सामना कर रहा/ रही होता/होती । वहीं समाज में आस पास का माहौल भी उसके लिए कुछ बदला बदला व्यवहार भी नजर आता है ।
जिसमे उसे ऐसा महसूस होता है कि जो कल तक उसके साथ हंस कर, मिल कर अपना संमझ कर साथ रहते थे,खेलते थे वे अब?
उससे कुछ छिपा रहे, दूर हो रहे या उसे शक की नजर से देख रहे।
यही भाव,व्यवहार उसके लिए तनाव पैदा करता है।
जहाँ उसके शारीरिक बदलाव ,जिसके बारे में उसे उचित ज्ञान नहीं रहता, उसके आस पास भी नहीं ऐसे लोग जो उसे उसके शारीरिक परिवर्तन पर खुल कर बात करते, बतलाते कि ये नैसर्गिक शारीरिक परिवर्तन हैं।
ईंनके कारण दुष्प्रभाव नहीं है, ये हर नारी, पुरुष में होता ही है।
कौन कहे, कौन समझाए?
हर जगह दुराव ,छिपाव के भाव।
कुछ यदि जिज्ञासा वश पूछ लिए तो?
कितना बदतमीज है, कितना गलत बात करता है, या डांट कर मौन ।
बचपन समाप्ति के उपरांत जैसे ही किशोरावस्था में आते हैं वैसे ही लड़को में आवाज में कर्कश पन का आना, शरीर में कठोरता , मूंछ दाढ़ी में रोम कूप खुलकर केश का आना,
और
चेहरे पर छोटे छोटे दाने जिन्हें हम पिम्पल्स या जवानी के निशान भी कहते है ,जो चेहरे की सुंदरता को बिगाड़ देता है, ऊपर से उस पिम्पल को नष्ट करने या उपचार पर अधकचरी जानकारी के साथ ,गंदे पुस्तक व क्रीम उपलब्ध,पर सही जानकारी का ह् होना ,मॉनसिक अवसाद उतपन्न कर देता।
वही तुम बड़े हो गए अब?
बचकाना हरकत बंद करो।
लड़कियों को रोक टोक
जो कल तक लड़को के साथ बराबरी से हँसती, खेलती,झगड़ती उसके हर कार्य में दखल अंदाजी , ये करो, ऐसे बैठो, अब जोर से न हंसो,
और छाती में पल्लू लो,
ये सब तो सब बोलेंगे पर उसकी परेशानी पर?
सब मौन
माहवारी क्या होता,
उस समय क्या सावधानी रखी जाए,
और उस समय साफ सफाई पर क्या किया जाए।
कोई बात करने वाले नहीं तो
मॉनसिक तनाव ही तो बढ़ेगा।
जब लड़को को बड़ा हो गया कहा जाता है तो,,
बड़ा मानकर उससे राय ,सहमति कहाँ ली जाती है।
यही कारण है।
अब तो तुम बड़े
हो गए इतना भी नहीं जानते।
चलो दो कश?
,अबओर् एक बात
अब बड़ा हो गया
तो
कुछ कमाई धमायी करता है
या पिता जी का ही कमर तोड़ रहा।
नवीन कुमार तिवारी

         

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