बाप और बेटी

बाप,माँ की तरह बेटी को नौ महीने कोख में नहीं पालता, लेकिन उस नौ महीने तक बाप की साँस भी हलक में ही अटकी सी रहती है। बेटी की पहली आवाज़ और पहली छुअन माँ को महसूस करने का वरदान है पर जब बेटी बाप की गोद में आती है तो लगता है उसका मुकम्मल जहाँ पूरा हो गया। माँ को गर्व होता और खुशी होती है कि उसे दुनिया का सबसे बड़ा सुख मिल गया और उसका स्त्रीत्व पूरा हो गया,पर असल मायने में बाप का पौरुष उसी दिन से शुरू हो जाता है जब नन्ही सी छोटो छोटी उंगलियां बाप के शरीर को छू के पूछती है -जिस तरह तुमने माँ को प्यार दिया,माँ को संभाला,दुनिया की तमाम बुराइयों से बचाया, मुझे भी बचा लोगे ना। एक अद्भुत सी ऊर्जा का संचार कर देती है बेटियां बाप की शिराओं में जहां वो अपने सामर्थ्य से भी आगे कर गुजरने को तैयार हो जाता। माँ अगर जड़ है तो बाप मिट्टी है जो जड़ को बांध के रखता है ताकि बेटी जैसी महकती हुई कली खिल सके। बाप,माँ की तरह आँख भर के रोता नहीं लेकिन रात को सोते वक्त तकिया उसका भी गीला होता है जो शायद संसार देखता नहीं और दिखना भी नहीं चाहिए क्योंकि हर बेटी अपने बाप में एक मजबूत इंसान एक सुपरहीरो तलाशती है और इसमें कहीं कोई बुराई भी नहीं।
[बाप अपनी आंखों में अपनी बेटी के सपने पालता है,उन्हें जवाँ करता है और और एक दिन बेटी की विदाई के साथ उन्हें भी विदा कर देता है, पर जो नहीं विदा कर पाता है वो है-पहली गुड़िया की टूटी नाक, पेंसिल की चबाया हुआ पिछले हिस्सा, कार की बैक सीट पर बाँधनेवाली बेल्ट,स्टडी रूम में पड़ी हुई पुरानी डायरी,छोटे छोटे मोजे, पहली सायकल,पहली ज़िद्द पर तोड़ी हुई कप और विदा होते वक़्त उफ़क उफ़क के रोया हुआ बाप।

         

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