स्त्रीत्व की राजनीति

स्त्रीत्व की राजनीति

आरोपों और प्रत्यारोपों की बारिश में हमेशा नारियों को ही भींगना होता है ।हर बार स्त्रियों के शील-शैय्या पर विषधर छोड़ दिये जाते हैं,जो स्त्रीत्व को अपने विषैले फन से बुरी तरह से नोच डालते हैं ।
आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इस हद को पार कर गयी है,कि वे स्त्रियों के अंतःवस्त्रों तक खुलेआम चली आती हैं । हर बार ,हर दौर में स्त्रीत्व की नीलामी सरेआम होता आया है ,और हो रहा है,,,फिर चाहे वो घर हो,दफ्तर हो,चौराहा हो,या राजनीति की कोई सभा हो ,,,,वहां सतीतत्व हरण होता ही होता है ,,,फिर चाहे वो बॉलीवुड की जया हो या धर्म पथ पर चलने वाली साध्वी प्रज्ञा हो ।इतना ही नहीं वो राजनीति की विपक्षी सोनिया या मायावती हो या कि पक्षीय सुषमा स्वराज हो ,,,,,सबका चीर हरण होता ही रहता है और हमारे तथाकथित पढ़े-लिखे लोग,बुजुर्ग,युवक यहां तक कि महिलाएं और हमारे देश के कर्णधार भी दुर्योधन से
लेकर गुरु द्रोण तक बने चुपचाप तमाशा देखते रहते हैं ।

ये एक नपुंसक समाज की ऐसी विकृत मानसिकता है,जिसने मर्यादा को ही बांझ बना दिया है ।ये नेता या दबंग हमेशा अपनी मर्दानगी इन औरतों पर ही दिखाता है । लेकिन सोचने वाली बात है कि आखिर क्यों इनकी शिकार हम महिलाएं ही होती हैं ? इसके लिए कुछ क्या बहुत हद तक हम स्त्रियां ही जिम्मेदार हैं ।हम असहायों की भांति कृष्ण के आने की प्रतीक्षा करती हुई पुकारती रह जातीं हैं,किंतु कभी लक्ष्मीबाई बन इनका विरोध नहीं कर पातीं और न ही काली बन इनका संहार करने का प्रयास ही करती हैं ।
हाल फिलहाल में जो जया जी के अंतःवस्त्रों की खिल्ली नेता जी ने भरी सभा में उड़ाई ।वे रावण की भांति अट्टाहस लगाते रहे और वहां बैठे लोग सामाजिकता को ताक पर रख कर तालियाँ पीटते रहे और लुत्फ़ लेते रहे ।इनकी तो छोड़िए इनसे उम्मीद ही क्या की जा सकती है ? लेकिन क्या वहां एक भी महिला कार्यकर्ता नहीं थीं,क्या श्रोताओं के बीच कोई नारी नहीं थी,,,जिनके पैर की जूती इनके हाथों से होती हुई नेता के गाल पर जा पड़ते । क्या ये वही देश है जहाँ अहिल्या ने पत्थर बनना स्वीकार किया था, जहां सीता ने महल सुख त्याग पति संग वन गमण करना ज्यादा श्रेयस्कर समझा? क्या इसी काल्पनिक दुनियाँ की ख़ातिर कल्पना ने अपनी जान गंवाई थी ?
बन्द करो ! अब स्त्रियों की अस्मिता को अपना हथियार बनाना ।बन्द करो ! इनकी ऊंची-नीची घाटियों से गुजर कर अपनी मंजिल तलाश करना । बराबरी न सही तो कम-से-कम स्त्री तो रहने दो । उनकी लज्जा को यूं सरेआम नीलाम न करो, कि कल को स्त्रियाँ लज्जा के मायने बदलने पर विवश हो जाएं ।
हालांकि जया जी के अंतःवस्त्रों ने कुछ युवाओं व नेताओं में खलबली तो मचाई ;फेसबुक-वाट्सएप पर सनसनी तो फैलाई ,किंतु अब तक भी इन बेशर्मो की आँखे नहीं लजाई । आखिर इसका जिम्मेदार कौन ?
हम स्वयं हैं,,,,,,,,,,हाँ, केवल हम ही हैं इसके जिम्मरदार। हमारा नैतिक पतन इस हद तक हो चुका है कि हम सामाजिक प्राणी तो दूर प्राणी कहलाने के लायक भी नहीं हैं ।पास के कमरों में सड़ती हुई लैश की दुर्गंध भी हमारे जमीर को जगाने में नाकाम रहती है ।हमारी इंसानियत यदि जिंदा होती तो फिर किसी की इतनी हिम्मत ही न होती कि वो सरेआम किसी स्त्री के अंतःवस्त्रों पर हमला कर सकने की जुर्रत भी करता ।

©स्वराक्षी स्वरा
खगड़िया बिहार

         

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