दहेज़ प्रथा परिणाम और निदान

दहेज़ प्रथा एक विकराल समस्या के रूप में कुरूपता से सारे संसार में व्याप्त है ।

*मैं अमीर व गरीब पर चर्चा न कर एक सामान्य,मध्यम परिवार पर ही ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा* ,।
दहेज़ लेना और देना पर हमेशा विरोधाभासी सोच लोगो, जन मानस में रहता है ।
जब दहेज़ लेने की बारी आये तो सुरसा सा मुख खुल जाता ।
जब देने की बारी आये तो ? अपने को बेबस ,लाचार और लड़की के जीवन के लिए पिताअपने जीवन को गिरवी भी रखना पड़ता है, जैसे विचार देखने ,सुनने को मिलते हैं।
ये दोराहा पन क्यों।
*इससे पहले कभी आपने सोचा एक नव वधु के ससुराल में नव वधु के सुंदरता, पढ़ाई लिखाई, व्यवहार कुशलता पर चर्चा तो बाद में होती है , जो भी चर्चा का मुख्य केंद्र होता है ,
वह बहु क्या लेकर आई?
,यह सवाल नव वधु के ससुराल पक्ष में जो भी इष्ट मित्र, परिवार, आस पड़ोस के लोग आते है उनका मुख्य सवाल, पहला सवाल यही होता ।
क्या ये सवाल सिर्फ ससुराल में ही पूछा जाता ?
जरा सोचिए? जरा विचारिये?
जवाब ,,,,, चलो मैं ही देता हूँ ।
नहीं ।
शायद बहुत से लोग इस बात से असहमत भी हो।
पर जब नव वधु अपने मायके वापस जाती है तो ?
वहाँ उसकी माँ से शुरू हुआ अंत हिन् यही सवाल सामने होता ।
तेरी सास ने तुझे क्या दिया, तेरे मुह दिखाई में कौन कौन क्या क्या दिए ।
तो सोचिये कौन जिम्मेदार है इस दहेज़ रूपी सुरसा के लिए ?

परिणाम तो बहुत विभत्स है।
मेरा परिवार भी इस दहेज़ रूपी बलिवेदी पर दहेज़ दानवों के शिकार हो चूका है ।
*निदान*
बेटियों को पढ़ा लिखा सक्षमता प्रदान किया जाना उचित होगा।
कथनी और करनी में अंतर दुर् करने सबसे पहले हमें ससुराल हो या ननिहाल दोनों जगह क्या लायी, क्या मिला शब्द पर ही प्रतिबन्ध लगाना चाहिए।

नवीन कुमार तिवारी,,

         

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