हमारी संस्कृति

*हमारी संस्कृति*
हमारी संस्कृति जल की तरह निश्चल है ।
जो जल की प्रवृत्ति है विलेयता, घुलनशीलता की वही हमारी संस्कृति है , *सबको अपने में समाहित कर लेना । विशाल हृदय का परिचायक बन जाता है* ।
जल एक गंध हीन, रंग हीन तरल पदार्थ के रूप में प्रायः पाया जाता है । पर ये पदार्थ के तीनों रूप में दर्शनीय है ,
तरल :- जल , वारी, नीर ,पय, पानी ,अम्बु
ठोस:- बर्फ ,ओला, तुषार ,हिम ,
वाष्प:- भाप रूप में ,बादल, वारिद, पयोधर, जलोदर, मेघ,वारिद
*जल की प्रवृत्ति के समान भारतीय संस्कृति भी है ।*
जल की प्रवृत्ति सिर्फ घुलनशीलता ही नहीं है ।
*निरन्तर चलायमान*
नदी, निर्झरिणी , के साथ अथाह जल राशि से भरे तालाब, पोखर, झील के साथ सागर को देखिये , वे हमेशा चलाए मान रहते है ।
इधर से उधर घुमड़ते हुए तेज गर्जन करते मेघराज की प्रवृत्ति से कौन भारतीय वाकिफ नहीं होगा ।
यही दृढ शक्ति जहाँ हमे शांत बनाती , दुसरो से विलग करती, अतिक्रमण सोच से दुर् रखती पर जब कोई ज्यादती पर उतर आये तो समुचित प्रतिरोध एक जुट होकर महा जल प्लावन सदृष्य सुनामी कहर या उत्तराखड विपदा भी ला सकती है ।
आप लोग सोचते होंगे जल हमेशा ऊपर से अधोगति ऊर्जा से वशीभूत हो नीचे की ओर अग्रसर रहती है । अर्थात निम्नता की ओर जाकर अपने अस्तित्व समाप्त कर जाती या अपने में कूड़े, करकट ,गंदगी अपशिष्ट मिला बदबूदार हो जाती है । सड़न से सराबोर हो जाती है , तो यह अधूरी सोच है , पानी निरंतर प्रवहमान रहते हुए गंदगी को धीरे धीरे किनारे तलछट पर छोड़ते स्निग्ध साफ परिमार्जित हो जाती है ।
एक बात और पानी हमेशा ऊपर से नीचे ऊर्ध्वाधर जाती है , ये सिंद्धांत भी गलत है । आपने अपने जीवन में पाताल तोड़ कुवें देखा होगा, पहाड़ियों के ऊपर बर्फ आच्छादित हिमालय के कई जगहों पर गर्म पानी के सोते निकलते है जो इस सिंद्धांत को गलत प्रतिपादित करते है। , इसीतरह हमारे जीवन में सुनामी त्रासदी एवं कलकत्ता पोरबंदर में सागर से वापस हुबली में पानी का बहाव , यह सिद्ध करता है कि जल ऊपर की ओर भी अग्रसर रहती है ।
इसी में बादलों का बनना भी इसी भाव को दर्शाता है ।
आप कहेंगे विषय *हमारी संस्कृति*
और
*हम कर रहे जल के प्रकृति का बखान ।*

यह बहुत जरूरी है , हमारी संस्कृति को समझने के लिए ।
हंमने जो भी गुण जल के बतलाये वही हमारी भारतीय संस्कृति के मूल में है , तभी आज भी अनेक विपरीत परिस्थितियों के होने के उपरांत हमारी हस्ती अविचल उतुंग शिखर के सामान ध्वज फहरा रही है ।
अनेक काल यवन आये जो भारतीय संस्कृति को समाप्त करने को लालायित रहे , पर अंत में राजा नहुष के नयन अग्नि से पूर्ण समाप्त होते जाते हैं।
हमारी विलेयता शांति ,अमन की परिचायक है ,दुसरो को सम्मान देने की आदत को लोग कायरता समझने की भूल भी कर लेते हैं , पर अंत में उन्हें पराजित हो शांति के मसीहा के पैरों में गिर अपराध बोध का ज्ञान भी होता है ।
हमारे संस्कृति में कभी भी हिंसा को प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया ।
जिसका आज भी सारा विश्व बिरादरी सम्मान करते हैं ।
हम मानते हैं , हम जानते भी हैं
कण कण में भगवान है, यही आस्था हमे, हमारे संस्कृति को दूसरों से महान बनाती है ।
कण से तात्पर्य *हर पिंड*
भगवान जो हमारे आस्था का पूर्ण प्रतीक है , का बनाया गया है ।
अतः हर मानव , जीव जंतु, खग, निशाचर, जलचर सभी ,अपने आप में पूर्ण भगवान का ही अंश है, तो उसका मर्दन नहीं , आलिंगन किया जाये।
यही हमारे संस्कृति का मूल सिद्धांत है ।
इसी कारण हम अतिथि देव भव कहते, जो शरणागत आता भले वह दुश्मन हो , दुशाचारित्र हो उसका प्राण रक्षा अपने प्राण देकर एक भारतीय ही करता है।
हर प्राणी के लिए भोजन, अपने भोजन के पूर्व एक भारतीय ही निकलता है ।
साईं इतना दीजिये, जामे कुटम्ब समाये।
मई भी भूखा न रहूं , साधु भी भूखा न जाये
अमन शांति पुरोधा ,सत्य अन्वेषण कार्य ।
जीयो जीने दो सिद्धांत, होये विश्व कल्याण ।
अंत में पुनः हम जल ही रहते , आओ, मिलो, गंदला भी करो।
पर हम सदा सत्य पर चलते हुए, सत्य परीमार्जन करते अपना परचम लहरा देते हैं ।
*नवीन कुमार तिवारी*

         

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