प्रेम

✍️……..#प्रेम….👌👌

अपने आप में पूर्ण होती परिभाषा
ईश्वरीय परम पुंज कह लो
या इंसानी अहसास समझो
प्रेम एक प्राकृत भावना है किसी की देय नहीं

कहते हैं न
“प्यार हो जाता है….”👌👌

ठीक वैसे ही जैसे
बरसात की बूंदों को ओस में
तब्दील होने की किसी से
इजाज़त नहीं लेनी होती

बस यूँ कि फूलों को खिलने की
किसी से मिन्नत नहीं करनी होती

या ऐसे भी कभी हवाएँ छू जाए
जिस्म को तो…. इक पल के लिए हुई
वो सिरहन… किसी वांछित भाव की कामना नहीं करती

यानि….. प्रेम …. प्रेम है , सिर्फ प्रेम
जिसका आगा-पीछा
घटत-बढ़त, उत्तेजना-उमंग
वासना या मिलन
किसी भी रूप से जुड़ी इसकी कोई
कल्पना ही नहीं हो सकती

प्रेम करना नहीं असल मे प्रेम को जीना आना चाहिए

प्रेम हो जाने के बाद भी जब हम उसमें चाहत के मायने ढूंढते है तो वो प्रेम कहाँ

प्रेम में डूबे बिना ही हम छिछली काई को छू कर खुद को दागदार करते हैं तो वो प्रेम नहीं

प्रेम में खुद को कैद नहीं होना पड़ता
अपने आप को आजाद कर दो
जो कुछ है मन मे ….. बस वो तेरा

न क्लेश , न द्वेष , न वहम , न जलन
न पीड़ा, न राग , न उन्माद, न लालसा

कुछ पाने की … कुछ लेने की चाह ही न हो
बस …. देना भाव
बस… सर्वस्व लुटाने का भाव
सरल रूप में खुद को उंडेल दो
प्रेम ऐसा हो कि आंख रोये भी ना
और प्रेमी को उस नमी का अहसास हो जाये

प्रेम ऐसा हो कि ओठों पर आई बात का पहले ही जवाब मिल जाये

चुप की अरदास प्रेम है
मौन की फरियाद प्रेम है

दूर दूर तक आकर्षण नहीं
देह लोलुपता का वशीकरण कोई मन्त्र नहीं

प्रेम में कोई रिश्ता होता ही नहीं
सच है…. हाँ यही सच है
हम जो रिश्ते प्रेम में जीते हैं
वे वाकई छूट जाने के भय से जीते है

माँ बाप भाई बहन यार दोस्त पति पत्नी सगे संबन्धी …. समाज के बनाये ये रिश्ते प्यारे बहुत है …. पवित्र भी है
पर इन सब में कहीं न कहीं भारी मोह है
गहरा लगाव है… ऐसा जुड़ाव है कि एक भी रिश्ता हाथ से छिटक जाए तो जीवन की पूरी माला छिन्न भिन्न ।।।।

ऐसे प्रेम से उबर में फिर बरसों लग जाते है या संभवतः सारी उम्र भी।।

प्रेम स्वछंद पंछी है
अपनी सहूलियत से उसे
मन के पिंजर में बांधे रखोगे तो वो
टिकने वाला नहीं।

प्रेम नदी की तरह है
प्रेम झरने सा निर्मल है
उसे तो बस अविरल बहना है
फिर चाहे वो आपको छू कर गुजर जाए या आपके भीतर भावनाओं के सागर में गोते लगाए
ठहराव कहीं भी नहीं होगा

प्रेम करने वाला और जिनसे प्रेम हुआ हो …. दोनों की रजामंदी एक हो तब भी ….. वैचारिक मतभेद या मानसिक सोच के दायरे भिन्न होते है
जरूरी नहीं कि हर बार हर बात आपकी ही सफल हो …. सामने वाले को भी समझना होता है … उसकी बात की कद्र करनी होती है।।

थोड़े में ही सार ये है कि “”कोई किला नहीं जीत लोगे “”
100 फीसदी खरी बात है … हमें इस बात का अहम रहे ही क्यों कि सामने वाले से प्रेम जता कर हमने उसे जीने की एक वजह दी है….न …न… कतई नहीं ।।
आप अगर ऐसा सोचते हो तो आप भुलावे में हो…. प्रेम में अहसान जताया नहीं जाता प्रेम में खुद को हावी नहीं करना होता है।

बस…..वही कहूंगी “देना भाव””
एक मात्र यही सबसे उत्तम संयोग है कि …. दो दिलों में प्रेम जागे तो
समर्पण का ….असीम समर्पण का संगम हो ….. प्रेम रिश्ता बन कर नहीं … प्रेम फरिश्ता बन कर आया है आपके जीवन मे…. उसे समझो…सहेजो…. सम्पूर्ण रूप में पनपने दो।

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

💫दीप💫

         

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