आदत काग़ज़ दिल की

तन्हाईओं से फर्क नही पड़ता मुझे
अब वीरानों की आदत सी हो गयी है!!

महफिलों में जाना छोड़ दिया है मैंने
अकेले रहने की आदत सी हो गयी है!!

तवील रास्तों से हो गया है प्यार मुझे
अब इतना चलने की आदत सी हो गयी है!!

मौजों से उठती लहरों से कर लिया अब प्यार मैंने
समुन्दर का सीना चीर कर सुनामियों से लड़ने की आदत सी हो गयी है!!

बड़े बड़े ख्वाब देखता हूं रातों को आजकल
सितारों से अब जी नही भरता मेरा
इस क़दर चाँद को पाने की आदत सी हो गयी है!!

स्वाद और कोई अब भाता नही है मुझको
इसकदर तेरे लबों के जायके की आदत सी हो गयी है!!

जिंदगी के सभी रंगों से रूबरू हुँ अब मैं
इस पल जीने और अगले पल मर जाने की आदत सी हो गयी है!!

मैं अंधो की बस्ती का वो बाशिंदा हुँ
जिसे खैरात की रोशनी पाने की आदत सी हो गयी है!!

मैंने रंगे गुलाल से रंग ली है रूह अपनी
इस क़दर लाल रंग से खेलने की आदत सी हो गयी है!!

मैं आज भी सोच समझ कर भरता हुँ स्याही अपनी कलम में
मुझे स्याही से कम अश्को से कागज दिल पे लिखने की आदत सी हो गयी है!!

अपनी जान की मुझे फिक्र नही जान तो जाएगी एक दिन
अपनी जिंदा लाश को रोजाना ढोने की अब आदत सी हो गयी है!!

©®soni…

         

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