आवाज़ है कागज़ दिल

दिल से निकली दिल को छूती आवाज़ है कागज़ दिल
दिल को भाता, दिल से आता एक साज़ है कागज़ दिल

कुछ लफ्ज़ लिखें कुछ मिटा दिए कुछ लिखना है बाकि
और बयां हुए जो लफ़्ज़ों में अहसास है कागज़ दिल

शब से लेकर के सुबहो तक दिल की बाते कहता
जिसे पढ़के हमको होता है वो नाज़ है कागज़ दिल

कुछ बयां हुआ कुछ छुपा हुआ कुछ आना है बाकी
जैसे एक दबा हुआ गहरा सा राज है कागज़ दिल

इसमें आने वाला कल है इसमें बीती यादें भी है
इसमें ही जो समाया है वो आज है कागज़ दिल

‘साहब’ इसके बारे में हम क्या बोलें बतलाओ
हर दिल में रहता बादशाह एक बेताज है कागज़ दिल ।।।

कृष्ण कुमार ‘साहब’

         

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