कागज दिल आंखे

तेरी आंखे

शर्माकर इठलाकर कागज दिल मुझको बतलाती आँखें
भौर प्राची में लाली वाली छटा मुझे दिखलाती आँखे
मैं अदना कागज पर लिखकर कागज दिल ही हो बैठा
भाव मेरे उस कागज के सारे ही बतलाती आँखे

होठ तुम्हारे कुमुद कली से, झील सी लहराती आँखे
भौर चहकती और महकती साँझ सी इठलाती आँखे
जेठ दुपहरी लू चलती हो , शीतलता की आशा न हो
उस पल हिम शिखरों जैसी ही राहत दिखलाती आँखे

पुरवाई सी आग लगाकर ,हर पल सिहराती आंखें
प्यासे दृग की प्यास बुझाकर , हर पल इठलाती आँखे
मूक अधर बोले न बोले, नयन भी अब न देखे है
सूखे कंठ सुधा से भरकर, अमृत बरसाती आँखे

मीत ह्रदय की गीत माधुरी समझी समझाती आँखे
श्वासो की, उच्छ्वासों की गति को समझाती आँखे
हारा थका अंकिचन बैठा लपटों से मैं जला हुआ
छटा रूप की पट घुँघट से दिखलाती आँखे

व्यथा कथा की प्रसव वेदना ,है बतलाती आँखे
सिंधु मिलन को आतुर उसकी कथा सुनाती आँखे
लहरों की उद्दाम पिपासा ,तोड़ दुकूलों के बंधन
राधे गीत आयत जैसी महक जताती आँखे

ऋषभ तोमर

         

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