कागज दिल है कर डाला – छाला

चाहत करके दिलवाले ने कागज दिल है कर डाला
उसी ह्रदय से गीत गजल लिख गीता को भी पढ़ डाला
लिखी किसी ने मधुशाला तो कागज दिल कुछ बोल उठे
मगर नयन से नीर झलक कर वो कहने लगा उर का छाला

गली गली में घूम रहे, लाज शरम पर दे ताला
उन लोगों ने बीच सड़क पर देखो ये क्या कर डाला
अबला की इज्जत लूटी,और हत्या निर्मम कर डाली
तब उगता है मेरे जैसे लोगो के उर में छाला

मेंहदी रंजित हाथों ऊपर नाम लिखा भोलाभाला
उसकी जुल्फों की छावो में पी लेता अमृत प्याला
लेकिन जब वो दूर हो जाये या दुनियाँ को छोड़ चले
तब वो पगला उस बिना साथी हो जाता है उर का छाला

वीणा का स्वर पाकर लिखती मीरा अपने उर का छाला
देख सुजान घनानंद रचते चाहत का इक प्यारा प्याला
वेद व्यास से मुझ अदने तक कई कोटि में आये है
उनको मनु से कवि करता है चाहत का इक उर छाला

देवदास पारो के प्रेम में जाकर रोता मधुशाला
मीरा प्रेम दीवानी होकर पी लेती विष का प्याला
पर ये चाहत कल्पवृक्ष है सोनजुही सी सुंदर है
हे मेरे मनु के तुम वंसज ,न कहना इसे उर का छाला

पीड़ा में आनद दिलाता ऐसा है ये उर का छाला
विष घट को अमृत कर देता ऐसा है ये भोलाभला
पंडित मोमिन पादरियों के सिर भी देखो झुकते है
राधा कृष्ण सा होकर मंदिर, मस्जिद होता है छाला

दुनियाँ में जो प्रेम बिखेरे ,ऐसा हो वो मतवाला
चाहत से दुनियाँ को जीतने चलता हो भोलाभाला
नफरत ,देहस्त ,और लोभ मद त्याग चुका जो इंसां हो
कर सकता है उसका स्वागत आज मेरे उर का छाला

हर जगह नफरत बटती है सूख गया रस का प्याला
तीज त्यौहार गये भारत के बची है केवल मधुशाला
बची है नफरत बची है देहस्त खून खराबे की होली
जीवन मे मद मस्त हो रहा सबके अंतर का छाला

मानवता जलती देखीं है हमने होली की ज्वाला
हर जगह नफरत बांटे है जीवन मे अंगूरी हाला
दुनियाँ वालो मधुशाला अब नफरत का है केंद्र बनी
जीवन मे सबसे प्यारा कुछ, न्यारा है उर का छाला

हर जगह हर गली मोहल्ले खुलती देखो मधुशाला
घर घर जाकर दूध दही सा बेच रही है मधुबाला
दूध दही मक्खन नही मिलते , न मिलती रोटी यारा
बस दुनियाँ में बाटता प्यारे दिल देने को इक छाला

बच्चन जी क्या खूब कही थी , खूब लिखी थी मधुशाला
लगा दिये थे चार चाँद जब लिख डाली थी मधुबाला
मैं कहता ये लिखने में उनको बड़ी सरलता थी
क्योंकि अंतर में उनके पीड़ा दायक इक छाला

बदल गया परिवेश वतन में बदल गई अब मधुशाला
वोट दिलाती ,दंगे करती ,घर परिवार उजाड़े हाला
नही रही ये दर्द निवारक , पास न इसको खींचो अब
बनी हुई है हर इंसा के उर में पड़ता इक छाला

आदरणीय बच्चन जी की मधुशाला से प्रभवित होकर

         

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