कागज़ दिल जल भी गया तो क्या

नफरत का सिक्का चल भी गया तो क्या ….
इस से तू ज़रा सा बदल भी गया तो क्या ….

तुम इज़हारे उल्फ़त कर दो खुलकर
दिल तो बच्चा है मचल भी गया तो क्या ..

हाँ वो आकाश नहीं छू पायेगा
जोश में दो फीट उछल भी गया तो क्या ….

प्यार धुआँ बनकर फैल गया हर सू
मेरा कागज़ दिल जल भी गया तो क्या …..

नफ़रत की गाड़ी में बैठा है तू
मुझ से ग़र दूर निकल भी गया तो क्या ….

मुझ से मुहब्बत करने वाले बहुत है
मैं ग़र दो इक को खल भी गया तो क्या ….

उल्फ़त की तपती धूप में ऐ – यारो
मैं बनकर मोम पिघल भी गया तो क्या …

पंकजोम ” प्रेम “

         

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